Page 32 - KV Datia Magazine
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आलस्यं हि मनुष्याणा शरीरस्थो मिान् ररपुुः |
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नास््युद्यमसमो बन्ुुः क ृ ्वा यं नावसीदति ||
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अथााथा:- मनुष्य का सबस बड़ा दुश्मन उसका आलस्य ि | पररश्रम जैसा दूसरा (िमारा ) कोई अनय ममत्र
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निी िोिा क्योंकक पररश्रम करन वाला कभी दुखी निी िोिा |
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अनादरो ववलम्बश्च वै मुख्यम ् तनष्ठ ु र वचनम ्
पश्चिपश्च पञ्चावप दानस्य दूषणातन च।।
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अथााथा:- अपमान करक दान दना, ववलंब (दर) से दना, मुख फर क दना, कठोर वचन बोलना और दने क बाद पश्चािाप
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करना| य पाच कियाए दान को दूवषि कर दिी ि।
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यस्िु सञ्चरिे दशान् सविे यस्िु पण्डििान् !
िस्य ववस्िाररिा बुद्ध्स्िैलबबनदुररवाम्भमस !!
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अथााथा:- वि व्यण्क्ि जो अलग अलग जगिों या दशो म घूमकर (पंडििों) ववद्वानों की सवा करिा ि, उसकी बुद्ध् का
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ववस्िार (ववकास) उसी प्रकार िोिा ि, जैस िेल की बूद पानी म धगरन क बाद फ़ल जािी ि |
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श्रोत्रं श्रुिेनैव न क ुं िलन, दानेन पाणणना िु ककणन ।
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ववभाति कायुः करुणापराणां, परोपकारना िु चनदनन ||
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अथााथा:- क ुं िल पिन लन स कानों की शोभा निी बढ़िी, अवपिु ज्ञान की बाि सुनन स िोिी ि | िाथ, कगन ्ारण करने
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स सुनदर निी िोिे, उनकी शोभा दान करने से बढ़िी िैं | सज्जनों का शरीर भी चनदन स निी अवपिु परहिि म ककय
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गये कायों से शोभायमान िोिा िैं।
अनुश्री श्रोबत्रय
8वीं

