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कविता







                                        आज तू बिखरा है एक रोज तू निखरगा!
                                                                              े
                                      ढला है जो आज सूर्य कल सुिह निकलगा!!
                                                                               े


                                    मािा तेरी मंजजल है इि लोहौं  की जंजीरौं  मेँ!

                                पर तू तपेगा जि तेरी तपि से िो लोहा भी वपघलगा!!
                                                                                     े


                                     मंजजलौं  क े रास्ते मेँ कााँट तो सभी क े मैं हैँ !
                                                               ेँ

                                  पर तेर अंदर जुिूि है तो तू का   ाँटोँ पर भी चलगा!!
                                         े
                                                                                   े


                                    मािा आज तू बिखरा है एक रोज तू निखरगा!
                                                                                 े
                                     ढला है जो आज सूरज कल सुिह निकलगा!!
                                                                                े


                                  हिाएाँ विपरीत क्र्ोँ ि चल तू कदम कदम िढ़गा |
                                                              े
                                                                                  े
                                 तुझे है कल क े ललए तैर्ार होिा तो आज तो गगरगा||
                                                                                    े

                                           तेरी कोलिि दख हिाओ का रूख!
                                                                    ँ
                                                          े
                                                 एक रोज तो िदलगा !!
                                                                   े


                                    मािा आज तू बिखरा है एक रोज तू निखरगा!
                                                                                 े
                                  ढला है आज जो सूरज कल सुिह  फिर निकलगा!!
                                                                                   े


                                                                                                              लििा क ु रिी
                                                                                                ै
                                                                                                                 ९ “अ”
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