Page 34 - kvshivpuri
P. 34
कविता
आज तू बिखरा है एक रोज तू निखरगा!
े
ढला है जो आज सूर्य कल सुिह निकलगा!!
े
मािा तेरी मंजजल है इि लोहौं की जंजीरौं मेँ!
पर तू तपेगा जि तेरी तपि से िो लोहा भी वपघलगा!!
े
मंजजलौं क े रास्ते मेँ कााँट तो सभी क े मैं हैँ !
ेँ
पर तेर अंदर जुिूि है तो तू का ाँटोँ पर भी चलगा!!
े
े
मािा आज तू बिखरा है एक रोज तू निखरगा!
े
ढला है जो आज सूरज कल सुिह निकलगा!!
े
हिाएाँ विपरीत क्र्ोँ ि चल तू कदम कदम िढ़गा |
े
े
तुझे है कल क े ललए तैर्ार होिा तो आज तो गगरगा||
े
तेरी कोलिि दख हिाओ का रूख!
ँ
े
एक रोज तो िदलगा !!
े
मािा आज तू बिखरा है एक रोज तू निखरगा!
े
ढला है आज जो सूरज कल सुिह फिर निकलगा!!
े
लििा क ु रिी
ै
९ “अ”

