Page 36 - kvshivpuri
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                                                                  ु
                                            मरी कहानी, मरी ही जबानी..
                                              े

                                              े
                                                                        े
                                       आइए लकर चलती हों मैं आपको अपन ही सिर में,
                                                                                ु
                                     ु
                                    कछ इस तरह बताती हों मैं अपनी कहानी अपनी जबानी।

                                                                              े
                                           ों
                                                                    े
                                                                       ैं
                                                                          ु
                                                                        े
                                         मा की कोख में रहकर नौ महीन मन गजार थे,
                                                                                  े
                                                                     े
                                                                                े
                                                                            े
                                     शिर इस दुशनया में आकर जाना अपन शकतन प्यार थ।।

                                                                                       े
                                      ों
                                                                 ों
                                                                                      ैं
                         छोटी थी तब मा का हाथ थाम कर - शपता की उगली पकडकर चलना मन सीखा था,
                                                                       ु
                                                                               ों
                                  शिर थोडा बडी हुई तो ठोकर खाकर भी खद जरा सभला था।

                                                      ु
                                                                             े
                                                                               े
                                                             ु
                                                                        ों
                                                                                    े
                               समझ आई जब थोडी तो खद की मस्कान को मा क े चहर पर दखा था,
                                                                            े
                                                                             े
                                                    ै
                                                                   े
                                                     े
                                    बीमारी क े समय मन शपता को भी परिान होत दखा था।।

                                           ज्यादा बडी तो नहीों बस १०  साल की हों मै,
                                                                                       ैं
                                                                        क
                                                                 े
                                                        े
                                                           ु
                                                            े
                                 पर अब कहीों ना कहीों अच्छ - बर होन का िक भी समझती हों म।

                                          े
                                               े
                                                     े
                                                          े
                                       बड होन क े नात छोट भाई का ध्यान जो रखती हों,
                                                                                      ों
                                                              े
                                                       ु
                                 समय-समय पर घर की कछ शजम्मदाररयोों को भी मैं शनभाती ह।।

                                              े
                                                                        े
                                                  ु
                                    समय का िरा कछ ऐसा है- पढ़ शलख लोग तो सब अपना,
                                                      े
                                            और ना पढ़ तो शिर कौन शकसका है ?

                                            ू
                                          स्कल में भी रहकर शिक्षकोों ने जो शिक्षा दी,
                                                                              े
                                          े
                                                    ों
                                                 े
                                            ु
                                     पहल गरु होत मा - शपता यही समझाइि उन्होोंन दी ।।

                                                        ु
                                               पढ़ शलख कछ नया कर जाना है,
                                            े
                                      ों
                                    हा , उसक साथ साथ घर क े और िजों को भी शनभाना है.
                                                                               ों
                                                                                                                                       अजशल गौर
                                                                                                            कक्षा- ५ ‘अ’
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