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मरी कहानी, मरी ही जबानी..
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आइए लकर चलती हों मैं आपको अपन ही सिर में,
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कछ इस तरह बताती हों मैं अपनी कहानी अपनी जबानी।
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मा की कोख में रहकर नौ महीन मन गजार थे,
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शिर इस दुशनया में आकर जाना अपन शकतन प्यार थ।।
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छोटी थी तब मा का हाथ थाम कर - शपता की उगली पकडकर चलना मन सीखा था,
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शिर थोडा बडी हुई तो ठोकर खाकर भी खद जरा सभला था।
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समझ आई जब थोडी तो खद की मस्कान को मा क े चहर पर दखा था,
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बीमारी क े समय मन शपता को भी परिान होत दखा था।।
ज्यादा बडी तो नहीों बस १० साल की हों मै,
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पर अब कहीों ना कहीों अच्छ - बर होन का िक भी समझती हों म।
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बड होन क े नात छोट भाई का ध्यान जो रखती हों,
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समय-समय पर घर की कछ शजम्मदाररयोों को भी मैं शनभाती ह।।
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समय का िरा कछ ऐसा है- पढ़ शलख लोग तो सब अपना,
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और ना पढ़ तो शिर कौन शकसका है ?
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स्कल में भी रहकर शिक्षकोों ने जो शिक्षा दी,
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पहल गरु होत मा - शपता यही समझाइि उन्होोंन दी ।।
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पढ़ शलख कछ नया कर जाना है,
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हा , उसक साथ साथ घर क े और िजों को भी शनभाना है.
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अजशल गौर
कक्षा- ५ ‘अ’

