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“भोर”
भोर गगन स गगरती ब द े
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य तन ताजा कर जाती ह ैं
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य चहचहाहट गचड़िया की
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मनमोहक राग सुनाती ह ै
दर- सबेर ननकलती ककरण ें
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नभ लाल- लाल कर दती ह ै
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स रज की वह प्रथम ककरण
उमूंग हृदय म भर दती ह ैं
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ककरणों का जब पुज कोई
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स्पर्श काया को करता ह ै
अूंगियार की एकाकी से
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मेरा साया भी ननकलता ह ै
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इन सरसराते पत्तों क सूंग
जब कोयल क क सुनाई द े
जस द र कह बजती वर्ी
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मिु मनभावन तान सुनाई द े
सच कह तो स्वगश िरा पर ह ै
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दखो नयनों से व उल्लास भरो
प्रातः काल टहलने ननकलो
असीम आनूंददत आभास करो|
सौम्या पाटिल
सातव ीं 'अ'

