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प्रगति मंत्र




                                                  स्थिरता ह नह ीं स् ींदगी,
                                                           ै
                                                    तूफानों स लड़ना ह।
                                                                    ै
                                                            े
                                                 अमल ज्ञान अपना करक,
                                                                       े
                                                   हमको आगे बढ़ना ह।
                                                                     ै
                                                  वीर पुरुष ह  रचत ह ,
                                                                     ैं
                                                                  े
                                                 अपने  ीवन का इततहास।

                                                   पड़े रहते  ो तनठल्ले,
                                                  ीवन बन  ाता उपहास।

                                                  भ्रष्टाचार क चक्रव्यू को,
                                                            े
                                                 हम को तोड़ तनकलना ह।
                                                                       ै
             स्थिरता ह नह ीं स् ींदगी,
                      ै
               तूफानों स लड़ना ह।
                               ै
                       े
           बहत गवाया समय व्यिथ म,
                                   ें
             ु
             यह  ह  ीवन का सच।
                   ै
             स्थिर रहना मत सीखो,

            ऊचे करो तनर्ाथररत लक्ष्य।
             ीं
            ज्ञान की सीढ़  पर चढ़कर,

                                                 ववज्ञान से आगे बढ़ना ह।
                                                                       ै
                                                  स्थिरता ह नह ीं स् ींदगी,
                                                           ै
                                                    तूफानों स लड़ना ह।
                                                                    ै
                                                            े
                                                 हो समिथ तुम शस्ततवान ,
                                                  अपनी शस्तत पहचानो।

                                                 ीवन क इस युद्र् क्षेत्र म,
                                                        े
                                                                        ें
                                                  हार न अपनी तुम मानो।
                                               सौ सौ बार ववफल हो कर भी ,

                                                   मूलमत्र यह  रढ़ना ह।
                                                        ीं
                                                                     ै
                                                  स्थिरता ह नह ीं स् ींदगी ,
                                                          ै
                                                    तूफानों स लड़ना ह।
                                                                    ै
                                                            े
                                                 अमल ज्ञान अपना करक ,
                                                                      े
                                                   हमको आगे बढ़ना ह।
                                                                     ै
                                                                                               दिक्षििा प्रजापति


                                                                                                किा - 8 'ब’
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