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फौजी
बचपन में जब पूछा था,
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क्या बनोगे बड होकर,
बहत गर्व से बोला था,
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फौजी बनूगा दश की खाततर।
सपना शुऱू हो चुका था,
जजस ददन मन में ठाना था।
उस ददन अपना तन मन धन,
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ससफ भारत माता को ही माना था।
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पररर्ार और बच्चों से समलन गया था जब र्ो,
डर थोडा सा लगा था मन को,
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क्या अगली बार दोबारा समल पाऊगा इनको।
युद्ध समय जब आया था,
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जीन मरन की फफक्र नहीूं थी।
ददल में उदासी फफर भी छाई,
पररर्ार का बस एक बार जजक्र र्हीूं था।
लडता रहा दश की खाततर,
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अपनी पूरी जान लगा कर।
ददल में गोली घुस चुकी थी ,
साूंस अभी भी नहीूं रुकी थी।
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मुह से शब्द ना तनकल पा रह थे,
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मन में ससफ शहीद
व
भारत माता क े नार लगाएूं जा रह थे।
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पहची खबर जब पररर्ार क े पास,
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रुक गई जैसे सब की साूंस।
बेट की शहीदी की खबर सुनकर,
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