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माूं की आूंख भर आई थी।
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रो मत गर्व से पपता बोल,
र्ह आज शहीद हआ ह।
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उसन भारत की धरती को अपना रक्त ददया है,
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और भारत माता क े आूंचल को छ ु आ ह।
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जब ततरगे में सलपटा हआ शर्
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घर क े आगे आया था।
छोट-छोट बच्चों की
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आूंख पल भर ना भरी,
समलकर सलामी दी थी उसे।
कहाूं बच्चों ने सर उठा कर
हमार पपता ने जान दी है दश की खाततर,
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हम भी फौज में जाएूंग े
आकाश की ऊचाइयों पर ततरगे को फहराएूंगे।
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प्रांजुल त्रिपरठी
कक्षर - 8 ‘ब’

