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कं ही मैं धनवान होने क े बजाय ककसी संकट में न फं स जाउं । काफी


               देर सोच-ववचार करने क े बाद व्‍याध ने यह घनष्‍कर्ि घनकाला कक इस

               चचडडया को िर न ले जाकर राजा को दे दें और पुरस्‍कार प्राप्‍त कर


               लूूँ। उसके  ददमाि में यह ववचार आते ही वह राजमहल की ओर चल


               ददया।राजमहल  में  पहंचकर  वह  राजा  से  बोला,  “महाराज  यह  एक
                                              ु

               ववचचत्र  चचडडया  है।  इसकी  ववष्‍ठा  धरती  पर  चिरते  ही  सोने  की  हो


               जाती  है।  इससलए  मैंने  सोचा  कक  इसे  अपने  अचधकार  में  लेकर

               आपको  दे  दें,ताकक  इसकी  स्‍वर्णिम  ववष्‍ठा  से  राजकोर्  में  बढ़ोत्तरी


               हो।” राजा चचडडया को पाकर बहत खुश हआ और उसने व्‍याध को
                                                                           ु
                                                             ु
               बहत-सा  धन  पुरस्‍कार  क े  रूप  में  प्रदान  ककया  ।  राजा  ने  अपने
                   ु

               सेवकों को बुलाकर कहा, “यह चचडडया अनमोल है। इसकी देखभाल


               में कोई कमी न रहने पाए।”  सेवको ने राजा का आदेश मानकर उस


               चचडया को एक सुदर से वपंजरे में कै द कर ददया और खाने–पीने का


               सामान भी उसमें रख ददया। उस ववचचत्र चचडडया क े ववर्य    में जब

               मंत्री  को  पता चला  तो  उसने  राजा  क े  पास  जाकर  घनवेदन  ककया-


               “महाराज यह व्‍याध इस जंिली चचडिया  को अनमोल और सोने की


               ववष्‍ठा काने वाली बताकर आपको मूखि बना िया । अिर यह सोने


               की ववष्‍ठा करने वाली होती तो वह व्‍याध स्‍वयं इसे पालकर धनवान

               न बन जाता । राजा को मंत्री की बातों में सच्‍चाई नजर आई और


               असने अपने सेवकों को बुलवाकर अस चचडया को बंधनमुक्‍त करने


               का आदेश दे ददया। बंधनमुक्‍त होकर उस चचडडया ने उपने घनवास
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