Page 81 - school magazine
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“संसार की सबस िूल्यर्ान र्स्तु सिय ही ह”| लककन िर्षमान में ज्यादार्र लोग ननरािामय
स्िंदगी िी रह ह और िे इर्िार कर रह होर्े ह कक उनक िीिन में कोई चमत्कार होगा,
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िो उनकी ननरािामय स्िंदगी को बदल दगा| दोस्र्ों िह चमत्कार
आि ि अभी स िुऱू होगा और उस चमत्कार को करने िाल
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व्यस्तर् आप ही ह, तयोंकक उस चमत्कार को आप क अलािा कोई
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दूसरा व्यस्तर् नही कर सकर्ा| इस िुरुआर् क शलए हमें अपनी
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सोच ि मान्द्यर्ाओ को बदलना होगा, तयोंकक “हिार साथ र्ही
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होता ह जो हि िानते ह|”
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आत्मविश्िास से आिय “स्िंय पर विश्िास एंि ननयंिि” स ह | दोस्र्ों हमार िीिन में
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आत्मविश्िास का होना उर्ना ही आिश्यक ह स्िर्ना ककसी फ ू ल में खुिबू (सुगंध) का होना,
आत्मविश्िास क बगैर हमारी स्िंदगी एक स्िन्द्दा लाि क समान हो िार्ी ह| कोई भी
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व्यस्तर् ककर्ना भी प्रनर्भािाली तयों न हो िह आत्मविश्िास क त्रबना क ु छ नही कर सकर्ा|
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आत्मविश्िास ही सफलर्ा की नींि ह, आत्मविश्िास की कमी क कारि व्यस्तर् अपने द्िारा
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ककय गए कायष पर संदह करर्ा ह| आत्मविश्िास उसी व्यस्तर् क पास होर्ा ह िो स्िंय स
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संर्ुष्ट होर्ा ह एंि स्िसक पास दृड़ ननश्चय, महनर् ि लगन,साहस,िचनबद्धर्ा आदद
संस्कारों की समपनर् होर्ी ह| - सौरभ चौहान XI
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