Page 76 - school magazine
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       चेहर स मुस्कान और आखों में अपनपन का भाि खोर्ा िा रहा ह। इस कफसलर्े िीिन क
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      पीछ  कारि  हमारी  शिक्षा  प्रिाली  भी  ह।  शिक्षा  में  अकों  क  खल, इनर्हास  क  र्थ्यों  और
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      भौनर्की क सूिों का र्ो स्िान ह कक ं र्ु बोलन की कला, व्यिहार क र्रीकों, सबंधों ररश्र्ों को
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      ननभान की क ु िलर्ा और त्रबना र्नाि क खुिहाल िीिन िीन की बार् कहाँ ह? मूल्यों की
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      ककर्नी चचाष होर्ी ह आि की कक्षाओ में और ककर्नी बार भािविव्हल होकर शिक्षक बच्चों
      क सामने प्रमपूिष िीिन का उदाहरि पि करर्े हैं? इन सब क बगैर िीिन की शिक्षाअधूरी ह।
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       आि  हमार  शिक्षि  संस्िान  गणिर्, विज्ञान,इनर्हास  ,अिषिास्ि  और  कमप्यूटर  का  ककर्ाबी
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      ज्ञान र्ो द रह हैं कक ं र्ु विद्यािी को स्िय स पहचान करन में चूक रहें हैं। यही ििह ह कक
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      िो ददल स इिीननयर ह िो  डॉतटर बनन की दौड़ में िाशमल ह। एक अच्छा णखलाड़ी भी
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      गणिर् क सूि याद करन में स्िय को खपा रहा ह। इन शिक्षि सस्िाओ में उन बच्चों को
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      अध्यापकों द्िारा कोसा िा रहा ह िो अच्छ अक नहीं ला पा रह ककन्द्र्ु अच्छ और प्यार
                                                                                                   े
      इसान होन की क ू बर् रखर्े हैं।
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         शिक्षकों स गैर शिक्षकीय कायष कराए िार्े हैं और काम क दबाि में एक शिक्षक  स्िर्िर्ा
      से काम नहीं कर पा रहा। अपनी आत्मा को शिक्षकीय धमष से नहीं िोड़ पा रहा।  शिक्षक
      इस खींचर्ान में बच्चों के  साि न्द्याय करने में चूक रहे हैं।
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       इन सब चुनौनर्यों क होर्े हए राष्ि को सिदनिील, सच्चे दिभतर् और स्िममदार नागररक
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      सौंपना शिक्षा व्यिस्िा और शिक्षक का परम दानयत्ि ही नहीं ,धमष भी ह। सबसे िऱूरी ह कक
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      इस पिे स शसफ िो ही िुड़ें िो शिक्षा को व्यिसाय नहीं, धमष समझर्े हैं। और इस पिे को
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                                                                        े
      उन्द्होंन  मिबूरी  में  नहीं, शिक्षकीय  स्िभाि  की  ििह  स  अपनाया  हो  ।  शिक्षा  विभाग  में
                                                                                      े
      साहसी, उच्च शिक्षा प्राप्र् विद्िान और िीिन मूल्यों की समझ िाल लोगों का चयन ककया
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                                                                 े
      िाए िो इस बोझ समझ कर नहीं बस्ल्क ददल स करें। िो िो बच्चों को पैसा कमाने की
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      मिीन नहीं बस्ल्क साहसी, दयालु और स्िममदार नागररक बनान का ख्िाब दखर्े हैं।िो िो
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      बच्चों की अयोग्यर्ा क शलए उन्द्हें कोसन की बिाय बच्चों क गुिों को पहचानें। उनस प्यार
                                                                         ं
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      से पेि आएं। कई बार अध्यापकों क र्ानों, उलाहनों से र्ग आकर बच्चे शिक्षि को बोणझल
                                                                                                 े
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      और कष्टदायी समझ लर्े हैं।िही शिक्षक सफल हैं  िो िीिन की शिक्षा दन में समिष हों
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                                                                          े
      और खुिहाल िीिन िीन, कदठनाईयों पर िीर् हाशसल करन क सूि बर्ा पाए। डॉ राधाक ृ ष्िन
                                                                                              ं
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      न कहा िा कक अगर हम दुननया क इनर्हास को दख,र्ो पाएग कक सभ्यर्ा का ननमाषि उन
                                                                           ं
      महान ऋवर्यों और िैज्ञाननकों क हािों स हआ ह,िो स्िय विचार करन की सामथ्यष रखर्े
                                                                ै
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      हैं,िो दि और काल की गहराइयों में प्रिि करर्े हैं,उनक रहस्यों का पर्ा लगार्े हैं और इस
                                                                                े
      र्रह से प्राप्र् ज्ञान का उपयोग विश्ि श्य या             लोक-कल्याि क शलए करर्े हैं।
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