Page 77 - school magazine
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साि ही बहद िऱूरी ह कक शिक्षकों को गैर शिक्षकीय कायों में नहीं उलझाया िाए तयोंकक इन
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कायों को समय सीमा में करन की बाध्यर्ा होर्ी ह और यही ििह ह की अपनी नौकरी पर
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आच आन क भय स शिक्षक इन कायों को शिक्षि स अगधक प्रािशमकर्ा दन लगर्े हैं। यहीं
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स शिक्षा मागष स भटक िार्ी ह। शिक्षा ही दि और समाि को समृद्ध और सुसस्क ृ र् बनार्ी
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ह। ककसी भी दि को सामास्िक बुराइयों स मुतर् करन क शलए िऱूरी ह कक इस ददिा में
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गचंर्न हो। ककर्ाबी ज्ञान से उठकर व्यस्तर्त्ि विकास और िीिन की शिक्षा पर भी उगचर्
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ध्यान ददया िाए। बच्चों को उगचर् अनुगचर् का फसला लना शसखाया िाए। सबस महत्िपूिष ह
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कक उन्द्हें स्िय सीखन क उगचर् अिसर प्रदान ककय िाए ।
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--- आलोक पंजाबी,
81, आस्था, अग्रसेन नगर िंदसौर
9424094014
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तनिा की, धो दता राकि झटक जाता था पागल र्ात भूलती थी िैं सीख राग
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चााँदनी िें जब अलक ें खोल, धूमल िें तुहहन किों के हार; बबछलते थ कर बारम्बार,
कली स कहता था िधुिास मसखाने जीर्न का सगीत तुम्हें तब आता था करुिि!
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बता दो िधुिहदरा का िोल; तभी तुि आये थे इस पार! उन्हीं िरी भूलों पर प्यार
- हपषवता सांखला
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बबछाती थी सपनों क जाल गय तब स फकतन युग बीत
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तुम्हारी र्ह करुिा की कोर, हए फकतने दीपक तनर्ावि! कक्षा 11
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गई र्ह अधरों की िुस्कान नहीं पर िैंन पाया सीख
िुझे िधुिय पीडा ा़ िें बोर; तुम्हारा सा िनिोहन गान

