Page 75 - school magazine
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मिक्षक हदर्स पर पर्िेष
आज की मिक्षा – चुनौततयााँ और सिाधान
-आलोक पंजाबी
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आि िब कोई दो या र्ीन िर्ष का बच्चा ददन भर घर आगन में खलर्ा-ठ ु मकर्ा निर आर्ा
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ह र्ो पड़ोशसयों को उसकी शिक्षा की गचंर्ा सर्ाने लगर्ी ह। “अभी र्क गचंटू को स्क ू ल में भर्ी
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नहीं कराया?” िैस प्रश्न गचन्द्ह उसक चहकर्े बचपन पर निर गढ़ाए रहर्े हैं। य आलम होर्ा
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ह कक कई बार र्ो पालकों को दबाि में आकर बच्चे को विद्यालय में प्रिि ददलिाना पड़ िार्ा
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ह। शिक्षा क व्यिसायीकरि न इस प्रिृवत्त को बढ़ािा ददया तयोंकक उन्द्हें िल्दी स िल्दी अपन
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ग्राहक को लपकना ह। िब 2 िर्ष का नन्द्हा सा बच्चा र्िाकगिर् “प्ल स्क ू ल” में पहचर्ा ह र्ो
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उसक साि ननर् नए प्रयोग होना िुऱू हो िार्े हैं। अभी उसन फ ू लों की खुिबू और उसक रगो
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से नार्ा िोड़ा ही होर्ा ह और उसे “ इस्ग्लि राइमस”रटिान की किायद िुऱू हो िार्ी ह।
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णखलौनों को िह िी भर क छ ू ना, खलना चाहर्ा ह और उस णखलौनों क बहाने “ए” फ़ॉर एप्पल
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शसखाया िान लगर्ा ह। िब िह ररश्र्ों को अपनी सहि बुद्गध स िानना चाह रहा होर्ा ह र्ो
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उस गणिर् क अकों में उलझा ददया िार्ा ह। िब िह दुननयाँ को अपनी मासूम मुस्क ु राहट स
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और र्ोर्ली बोली स चककर् करने िा रहा होर्ा ह र्ो उसे अचानक ररपोट काडष िमा ददया
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िार्ा ह। और कोई पालकों स पूछ कक य बदहिासी तयों? र्ो कहर्े हैं कक िमान क साि नहीं
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चल र्ो हमारा बच्चा वपछड़ िाएगा। कोई य र्ो पूछ कक अपन बच्चे को चलर्ा कफरर्ा
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एनसाइतलोपीडडया बनाना चाहर्े हैं या कफर एक सिदनिील इसान स्िसक हृदय में प्रम और
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करुिा का झरना बहर्ा हो।िो अपनी रुगचयों को साि लेकर सहि होकर सीख, पढ़ और
प्रसन्द्न होकर अपना िीिन िी सक।
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डॉ सिषपल्ली राधाक ृ ष्िन ने अपने िन्द्मददन को शिक्षकों को समवपषर् ककया िा और र्ब से 5
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शसर्बर को हम उनक िन्द्मददन को शिक्षक ददिस क ऱूप में मना रह हैं। उन्द्होंन कहा िा “
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शिक्षक िह नहीं िो छाि क ददमाग में र्थ्यों को िबरन ठ ूंस, बस्ल्क िास्र्विक शिक्षक र्ो िह
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ह िो उस आन िाल कल की चुनौनर्यों क शलए र्ैयार कर।“ ककन्द्र्ु आि ज्ञान को ठ ूँसने की
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होड़ लगी ह। सहि, समपूिष व्यस्तर्त्ि का विकास नहीं हो पा रहा ह और युिा इस होड़ में
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अपन मूल स्िऱूप को भूल रह हैं। अपन स्िभाि और रुगचयों को नहीं बस्ल्क “पैकि” और
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“कमपस शसलेतिन” क सपन दख रह हैं। और बढ़र्ी कोगचंग तलासस और शिक्षा की दुकानों न
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युिाओ की इस भूख को बढ़ाया ह। तयों िी रह हैं, य नहीं पर्ा। प्रमोिन और पैसा ही भगिान
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होर्ा िा रहा ह। िीिन रसहीन होर्ा िा रहा ह। िुष्कर्ा और स्िािष मानिीय मूल्यों पर हािी
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हो गए हैं ।

