Page 57 - school magazine
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िैं सुिन हाँ "िुक्तत की आकांक्षा"
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व्योम क नीचे खुला आिास मेरा; गचडड़या को लाख समझाओ
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ग्रीष्म, िर्ाष, िीर् का अभ्यास मेरा; कक वपंिड़े क बाहर
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झेलर्ा हँ मार माऱूर् की ननरर्र, धरर्ी बहर् बड़ी ह, ननमषम ह,
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खलर्ा यों स्िदगी का खल हसकर। िहॉ ं हिा में उन्द् हें
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िूल का ददन रार् मरा साि कक ं र्ु प्रसन्द्न मन हँ ू अपने स्िस् म की गध र्क नहीं शमलेगी।
मैं सुमन हँ…
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यूँ र्ो बाहर समुर ह, नदी ह, झरना ह,
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र्ोड़न को स्िस ककसी का हाि बढ़र्ा, पर पानी क शलए भटकना ह,
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यहॉ ं कटोरी में भरा िल गटकना ह।
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मैं विहस उसक गल का हार बनर्ा;
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राह पर त्रबछना कक चढ़ना दिर्ा पर,
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बाहर दाने का टोटा ह,
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बार् हैं मर शलए दोनों बराबर।
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यहॉ ं चुग् गा मोटा ह।
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मैं लुटान को हृदय में भर स्नदहल सुरशभ-कन हँ ू
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बाहर बहशलए का डर ह,
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मैं सुमन हँ…
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यहॉ ं ननद्िद्ि कठ-स् िर ह।
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ऱूप का श्ृंगार यदद मैंन ककया ह,
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कफर भी गचडड़या
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साि िि का भी हमेिा ही ददया ह;
मुस्तर् का गाना गाएगी,
णखल उठा हँ यदद सुनहर प्रार् में मैं,
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मार िाने की आिंका से भर होने पर भी,
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मुस्कराया हँ अधरी रार् में मैं।
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वपंिर में स्िर्ना अग ननकल सकगा,
मानर्ा सौन्द्दयष को- िीिन-कला का सर्ुलन हँ ू
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ननकालेगी,
मैं सुमन हँ…
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हरसूँ ज़ोर लगाएगी
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और वपंिड़ा ट ू ट िान या खुल िान पर उड़
द्र्ारा : हपषवता तेलकार( ११ ब)
िाएगी।
पीयूषा बुगद ११र्ी
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